सोमवार, २५ एप्रिल, २०२२

सभ्यता या घोर असभ्यता - १

एक तरफ अमरीका के श्वेत लोग है जिन्होंने नीग्रों के प्रति अपने अमानवीय बर्ताव के लिए माफ़ी मांगी. उनके धर्मगुरुओं ने भी माफ़ी मांगी. और दूसरी तरफ भारत के सवर्ण है जो उन्ही के धर्म के अस्पृश्यों (एससी) के प्रति अमानवीय बर्ताव के प्रति माफ़ी मांगना तो दूर उन्हें अपने बर्ताव पर गर्व है. वो मानते ही नहीं की उन्होंने अपने बर्ताव से कुछ करोड़ लोगों की सैकडो पीढ़िया बरबाद की. इसलिए आए दिन वे झूठ लिखते रहते है की उनकी वजह से अस्पृश्यों (एससी) को कुछ भी तकलीफ नहीं हुई. आज के युवको मे से  बहोत से युवको को हिंदू धर्म अस्पृश्यों (एससी) के साथ कैसा बर्ताव किया ये मालुम नहीं है. क्योंकि वो लोग तो बताएंगे नहीं. कितना सताया ये मालुम नहीं है. हिदू धर्म में अस्पृश्यो को क्या क्या करना मना था और उनको कौनसे काम जबरदस्ती से करवायें जाते थे इसके बारे में डॉ. अम्बेडकर लिखते है, "अस्पृश्यों ने हिंदू जाति की संस्कृति को अपनाया है. वे हिंदू जाति के धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते है. वे हिंदुओं की धार्मिक तथा सामाजिक परंपराओं का आदर करते है. वे हिंदुओं के तीज-त्योहार मनाते है. लेकिन उन्हें उसका कोई लाभ नहीं मिलता. उल्टे उनसे दुराव और अलगाव किया जाता है. क्योंकि हिंदू मानते है कि अस्पृश्यों के स्पर्श से वे भ्रष्ट हो जाते है, अत: उन प्रयोजनों को छोड़कर जो अस्पृश्यों के बिना पुरे नहीं हो सकते, उनके साथ हर प्रकार का सामाजिक व्यवहार निषिद्ध होता है. वे गांव के बीच में नहीं रहते. वे गांव के बाहर रहते है. हर गांव का अपना एक इलाका होता है, जो अस्पृश्य होता है, वह गांव से जुड़ा तो होता है, पर गांव का हिस्सा नहीं होता. शेष हिंदुओं से अलग-थलग उन्हें एक ऐसी आचरण-संहिता से जकड दिया जाता है, जो दासों के लिए ही उपयुक्त होती है. इस संहिता के अनुसार अस्पृश्य ऐसा कुछ नहीं कर सकता, जो उसे जीवन के नियत से ऊपर उठा सके. उसे अपने दर्जे से ऊंचे स्तर के कपडे नहीं पहनने चाहिए और न ही किसी अस्पृश्य महिला को अपने से ऊंचे वर्ग की हिंदू महिलाओं के जेवरों जैसे जेवर पहनने चाहिए. गांव के शेष हिंदुओं के घरों के मुकाबले उसका घर बेहतर या बड़ा नहीं होना चाहिए. निश्चय ही अस्पृश्यों को हिंदू के सामने बैठना नहीं चाहिए और उसका उसे हमेशा पहले अभिवादन करना चाहिए. निश्चय ही अस्पृश्यों को न तो साफ़ वस्त्र पहनने चाहिए और न ही पीतल या तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करना चाहिए. उसे चांदी या सोने के जेवर भी नहीं पहनने चाहिए. जब हिंदू के परिवार में कोई मौत हो जाए तो अस्पृश्य को उस परिवार के रिश्तेदारों को मौत की खबर देने के लिए जाना चाहिए, भले ही वे कितनी दूर क्यों न रहते हों, क्योंकि यह खबर डाक से भेजने पर गांव में हिंदू अपने रिश्तेदारों में अपने को गिरा हुआ अनुभव करने लगता है. यदि हिंदू-घरों की स्त्रियां अपने मायके जाए या वहां से वापस आए तो अस्पृश्य को उनके साथ जाना ही पडेगा. उनकी प्रतिष्ठा का तकाजा है कि उनके नौकर-चाकर होने चाहिए. और केवल अस्पृश्य ही वह एकमात्र उपलब्ध वर्ग है, जिससे यह काम कुछ खर्च किए बिना कराया जा सकता है. हिंदू के घर के हर समारोह में अस्पृश्यों को आकर दासोचित कर्म करना ही चाहिए. अस्पृश्य को न तो जमीन खरीद कर उस पर खेती करनी चाहिए और न ही उसे स्वतंत्र जीवन बिताना चाहिए. अपना पेट भरने के लिए उसे हिंदू-घरों की झूठन पर निर्वाह करना चाहिए और गांव में मरने वाले पशुओं का मांस खाना चाहिए. इस झूठन को इकठ्ठा करने के लिए उसे घर-घर जाना चाहिए. भीख मांगने के लिए उसे शाम के वक्त जाना चाहिए. इसी तरह अस्पृश्य को मरे हुए जानवर को गांव से बाहर ले जाना ही पडेगा. निश्चय ही उसे यह काम अकेले ही करना चाहिए, क्योंकि कोई भी हिंदू इसमे उसका साथ नहीं देगा. अस्पृश्य को ऐसे धंदे नहीं करने चाहिए, जो उसे सवर्ण हिंदुओं के ऊपर सत्ता और अधिकार दे. उसे विनम्र होना चाहिए और उससे अधिक की मांग नहीं करनी चाहिए, जो उसे नियत किया गया है.

- डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (सभ्यता या घोर असभ्यता) 

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