सोमवार, २५ एप्रिल, २०२२

सभ्यता या घोर असभ्यता - २

हिंदू धर्म की कुछ रूढ़ियां जो देश के अलग-अलग भागों में फैली हुई थी. जिनको इतिहास का ज्ञान नहीं उनको पता भी नहीं होगा. आप सोच सकते है उन्होंने कितनी तकलीफे उठाई होगी. डॉ. अम्बेडकर उनके बारे में कहते है : "अस्पृश्य उन्हें कहा जाता है, जो केवल शारीरिक स्पर्श से भ्रष्ट करते है. लेकिन ऐसे लोग भी है, जो तब भ्रष्ट करते है, जब वे निश्चित दुरी पर न रहकर पास आ जाते है. इन्हें सामीप्यवर्जित कहा जाता है. उनसे भी खराब स्थिति में वे लोग है, जिनको देखने मात्र से भ्रष्ट होने का पाप लग जाता है. ये दृष्टिवर्जित कहलाते है. नयाडी लोग सामीप्यवर्जित लोगों की श्रेणी में आते है. उनके बारे में कहा जाता है कि 'वे कुक्कुरभक्षी होते है और हिंदुओं में सबसे अधम जाति के है. भीख मांगने में वे सबसे ज्यादा हठी लोग है. वे किसी भी व्यक्ति का, चाहे वह पैदल चले, सवारी करे, नौका यात्रा करे, मीलों तक पीछा करेंगे और उससे दूर-दूर रहकर उसके पिछे-पिछे चलते जाएंगे. यदि उन्हें कोई चीज दी जाती है तो उसे भूमि पर ही रखना होगा और जब उसे देने वाला व्यक्ति पर्याप्त दुरी पर पहुंच जाएगा, तभी प्राप्त करने वाला व्यक्ति सहमता हुआ आगे बढ़ता है और उसे उठाता है.

मद्रास प्रेसिडेंसी के तिन्नेवल्ली जिले में दृष्टिवर्जित लोगों का ऐसा वर्ग है, जिसे पुराडा वन्ना कहते है. उनके बारे में कहा जाता है कि दिन में उन्हें बाहर आने की अनुमति नहीं, क्योंकि उन पर दृष्टी पड़ने से ही आदमी भ्रष्ट हो जाता है. ये अभागे लोग निशाचरों जैसा जीवन जीने के लिए विवश है. वे अंधेरे में अपनी मांद से बाहर निकलते है और पौ फटने से पूर्व ही लकडबग्गे, बिज्जू की भांति अपने-अपने घरों की और लौट पड़ते है.

सामीप्यवर्जितो तथा दृष्टिवर्जितो की क्या कठिनाइयाँ होगी? वे अपना जीवन कैसे काटते होंगे? यदि उनका दर्शन या उनका सामीप्य भी सहन नहीं किया जाता तो वे क्या रोजगार कभी पा सकते है? भीख मांगने और कुत्ते का मांस खाने के अलावा वे कर भी क्या सकते है? निश्चय ही कोई भी सभ्यता इससे अधिक क्रूर नहीं हो सकती.

बंबई प्रेसिडेंसी में द्वारिका नगर में महान हिंदू देवता कृष्ण का विख्यात मंदिर है. वहां का नियम है कि सड़कों पर चलते समय हर अस्पृश्य को अपने हाथों से ताली बजानी होगी और कहना होगा, 'बचो, बचो', ताकि इस बात की घोषणा हो सके कि वह अस्पृश्य है और स्पृश्य सवधान हो जाए."

- डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (सभ्यता या घोर असभ्यता) 

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