सोमवार, २५ एप्रिल, २०२२

डॉ आंबेडकर और गांधीजीका सामाजिक सुधारो का तरीका

डॉ. अम्बेडकर ने कालाराम मंदिर नासिक में अस्पृश्यों के मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन किया था। उनका सामाजिक सुधारों का तरिका मा. गांधी के सामाजिक सुधारों अलग था।

गुरुवायूर मंदिर अस्पृश्यों के लिए खुला हो इसलिए केल्लप्पन नामक एक सवर्ण ने सत्याग्रह शुरू किया था। उस वक्त मा. गांधी रुढ़िवादियों के साथ एक तरह का समझौता करने के लिए तैयार हो गए थे। वह समझौता इस प्रकार था। मा. गांधी के ही शब्दों में, "दिवस के किसी निश्चित समय में गुरुवायूर मंदिर के कपाट हरिजनों तथा उन अन्य हिंदुओ के लिए खोले जाए जिन्हें हरिजनों के उपस्थिति पर कोई आपत्ति नहीं है और किसी अन्य निश्चित समय में उसे उन लोगों के दर्शनार्थ आरक्षित कर दिया जाए जिन्हें हरिजनों के प्रवेश पर आपत्ति है। इस सुझाव की स्वीकृति में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए क्योंकि गुरुवायूर में कृतिकाई एकादशी पर्व के अवसर पर हरिजनों को हिंदुओं के साथ-साथ प्रवेश की अनुमति दी जाती है और उसके बाद मंदिर या देवमूर्ति की शुद्धि की जाती है।"

जब पूछा गया कि क्या उनका सुझाव था कि हरिजनों के प्रवेश के बाद प्रतिदिन मंदिर की शुद्धि की जाए तो मा. गांधी ने उत्तर दिया : "व्यक्तिगत रूप से मै किसी भी शुद्धि के पक्ष में नहीं हूं। लेकिन यदि शुद्धि से आपत्ति करने वालों की अंतरात्मा को संतोष मिलता हो तो मै इस मामले में व्यक्तिगत रूप से शुद्धिकरण पर कोई आपत्ति नहीं करूँगा।"

इसपर डॉ. अम्बेडकर कहते है, "मुझे मालुम नहीं कि कोई स्वाभिमानी अस्पृश्य श्री. गांधी के इस दृष्टिकोण को स्वीकार करेगा। इन शर्तों पर तो कुत्तो और बिल्लियों को भी सभी मंदिरो में प्रवेश करने दिया जाता है, जब कि वहां मानव-प्राणी नहीं होते।"

एक अमरीका के श्वेत लोग थे जिन्होंने अश्वेत नीग्रो की मुक्ति के लिए अपने ही श्वेत भाई-बंधुओं से रक्तरंजित लड़ाई की थी। उस में करीब दस लाख श्वेत हुतात्मा हुए। और यहाँ भारत में सामाजिक सुधारों के लिए सवर्णों के साथ रक्तरंजित लड़ाई करना तो दूर, अगर सवर्ण हिंदू सामाजिक सुधार का विरोध करते हैं तो सवर्ण हिंदू के मन को ठेस ना लगे यह ध्यान में रखकर सामाजिक सुधार किया जाता था। यह सवर्णों का कैसा सामाजिक सुधार कार्य था।

अगर डॉ. अम्बेडकर सामाजिक सुधार के बारे में मा. गांधी के विचार अपनाते तो आज क्या स्थिति होती ये आप सोच सकते है। 

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