अनुसूचित जाती, जमातींना त्यांच्यावर होणा-या अत्याचाराच्या बाबतीत न्याय का मिळत नाही यासाठी कोण आणि कुठली परिस्थिती जबाबदार आहे याविषयी डॉ. आंबेडकरांचे मत खालील प्रमाणे आहे.
"तीसरी अड़चन जो अस्पृश्यों की असहाय स्थिति को बिकट बनाती है, वह यह है कि अस्पृश्यों के लिए यह संभव नहीं कि वे पुलिस से सुरक्षा और अदालतों से न्याय प्राप्त कर सकें। पुलिस के लोग सवर्ण हिंदुओं के वर्गों से भरती किए जाते है। मजिस्ट्रेटों के पद पर भी सवर्ण हिंदुओं के लोग होते है। पुलिस और मजिस्ट्रेटों के वर्ग से सवर्ण हिंदुओं का नाता सगे-संबंधी जैसा है। अस्पृश्यों के प्रति वे भी सवर्ण हिंदुओं की भांति भावनाओं और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहते है। यदि कोई अस्पृश्य किसी पुलिस अधिकारी के पास सवर्ण हिंदू के खिलाफ शिकायत दर्ज करने जाता है तो सुरक्षा के स्थान पर उसे ढेर सारी गालियां सुननी पडती है। या तो उसे शिकायत दर्ज किए बिना ही भगा दिया जाता है या रिपोर्ट ऐसी झूठी दर्ज की जाती है कि उसमे स्पृश्य हमलावरों को बच निकलने का मार्ग मिल जाता है। यदि वह मजिस्ट्रेट की अदालत में अपराधियों के खिलाफ मुकदमा दायर करता है तो उस पर क्या कार्रवाई होगी, यह पहले ही मालुम हो जाता है। किसी अस्पृश्य को कोई हिंदू गवाही देने के लिए नहीं मिलेगा, क्योंकि गांव में पहले ही षडयंत्र रच दिया जाता है कि कोई भी अस्पृश्य की हिमायत नहीं करेगा, चाहे सच कुछ भी क्यों न हो। यदि वह गवाह के रूप में अस्पृश्यों को पेश करता है तो मजिस्ट्रेट उनकी गवाही स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि वह आसानी से कह देगा कि वह तो उसी का हितैषी है, इसलिए उसे स्वतंत्र गवाह नहीं कहा जा सकता। यदि वे स्वतंत्र गवाह है भी तो मजिस्ट्रेट के सामने एक आसान-सा तरिका यह कह देना है कि उसे अस्पृश्य के पक्ष में गवाह सच्चा नहीं प्रतीत होता। वह निडर होकर ऐसा फैसला सुना देगा, क्योंकि वह भली-भांति जानता है कि उसके ऊपर कोई अदालत उसके इस फैसले को नहीं बदलेगी, क्योंकि यह एक स्थापित नियम है कि अपील सुनने वाली अदालत मजिस्ट्रेट के फैसले में दखल न दे, जो गवाहियों पर आधारित है और जिनकी उसने जांच की है। दुर्भाग्य यह है कि पुलिस कर्मचारी तथा मजिस्ट्रेट भ्रष्ट होने की अपेक्षा अधिक पक्षपातपूर्ण होते है। हिंदुओं के प्रति उनके इस पक्षपातपूर्ण और अस्पृश्यों के प्रति विरोधपूर्ण रवैये के कारण ही अस्पृश्यों को न्याय और सुरक्षा नहीं मिल पाती। पुलिस तथा मजिस्ट्रेट को अपनी प्रेरणाओं, अपने हितों और संस्कारों के कारण अस्पृश्यों की भावनाओं के साथ सहानुभुति नहीं होती। इसके फलस्वरूप वे लोग अस्पृश्यों की आकांक्षाओं के प्रति खुलकर विरोधी और विद्वेषपूर्ण हो जाते है।
इसका सबसे अधिक बुरा पक्ष यह है कि यह सब अन्याय और अत्याचार कानून की सीमाओं के अंदर किया जा सकता है। पुलिस अपनी शक्ति और अपने अधिकार का दुरुपयोग कर सकती है। पुलिस अधिकारी ऐसी बात को दर्ज कर सकता है जो कही ही नहीं गई या ऐसी बात को दर्ज कर, जो कही गई बात से नितांत भिन्न हो, जान-बुझकर अपने रिकार्ड तोड़-मरोड़ सकता है। वह उस पक्ष को गवाहों के नाम-पते आदि बता सकता है, जिसमे उसका स्वार्थ होता है। वह किसी को गिरफ्तार करने से इंकार कर सकता है। वह किसी मामले को ख़त्म करने के लिए कुछ भी कर सकता है। वह यह सब काम पकड़े जाने के डर के बिना कर सकता है। मजिस्ट्रेट ने उसे अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह छूट दे रखी है। किसी भी मामले का निर्णय गवाहों पर निर्भर करता है, जो गवाही दे सकते है। लेकिन मुकदमे का निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि क्या गवाहियां विश्वसनीय है या नहीं। यह मजिस्ट्रेट पर निर्भर करता है कि वह किस पर विश्वास और किस पर अविश्वास करता है। वह किसी भी पक्ष पर विश्वास करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। ऐसे बहुत से मामले है, जिनमे मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक का इस्तेमाल अस्पृश्यों के हितों के खिलाफ किया है। अस्पृश्यों की गवाहियां चाहे कितनी भी सच्ची क्यों न हो, मजिस्ट्रेट सभी मामलों में एक ही बात कह देता है, 'मुझे गवाहों पर विश्वास नहीं है'। कौन-सी सजा सुनाई जाए, यह भी मजिस्ट्रेट का विवेकाधिकार है। अगर उचित न्याय नहीं हुआ है तो उचित न्याय पाने का रास्ता अपील होती है। मजिस्ट्रेट द्वारा यह कह दिया जाता है कि इस मामले में दिए गए निर्णय के खिलाफ अपील नहीं हों सकती।"
बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर, सम्पूर्ण वाङमय खंड-10 (पृष्ठ 177-180)
मी या परिस्थितीसाठी अप्रत्यक्षरित्या मा. गांधींना जबाबदार धरतो. कारण त्यांनी उपोषणाद्वारे ब्लैकमेल करुन पुणे करार घडवून आणला नसता तर आज अनुसूचित जाती, जमातीचे १३१ खरे नेते निर्णय प्रक्रियेत असते आणि त्यांनी सवर्ण उच्चवर्णियांच्या हातात मोक्याच्या जागा जाऊ देण्यास नक्कीच विरोध केला असता.