रविवार, १० ऑक्टोबर, २०२१

अनुसूचित जाती, जमातींना त्यांच्यावर होणा-या अत्याचाराच्या बाबतीत न्याय का मिळत नाही?

ज्यांच्या एका आदेशाने तपासाची दिशा बदलू शकते अशा सीबीआय पासून वेगवेगळ्या तपास संस्थांतील अधिकाराची पदे सवर्ण उच्चवर्णियांच्या हातात आहेत. सर्वोच्च न्यायालयातील ३३ पैकी २८ न्यायाधीश सवर्ण आहेत. दुसरीकडे अट्रोसिटीच्या प्रकरणातले ९६% आरोपी निर्दोष सुटतात म्हणून अट्रोसिटीच्या केसेस खोट्या असतात अशी सवर्णांकडून ओरड केली जाते. अनुसूचित जाती, जमातीवर होणा-या अत्याचाराच्या बाबतीत त्यांनी मोठ्या प्रमाणात मोर्चे, आंदोलने केल्याशिवाय त्यांना न्याय मिळणे तर सोडा त्याची साधी दखल सुद्धा घेतली जात नाही. 

अनुसूचित जाती, जमातींना त्यांच्यावर होणा-या अत्याचाराच्या बाबतीत न्याय का मिळत नाही यासाठी कोण आणि कुठली परिस्थिती जबाबदार आहे याविषयी डॉ. आंबेडकरांचे मत खालील प्रमाणे आहे. 

"तीसरी अड़चन जो अस्पृश्यों की असहाय स्थिति को बिकट बनाती है, वह यह है कि अस्पृश्यों के लिए यह संभव नहीं कि वे पुलिस से सुरक्षा और अदालतों से न्याय प्राप्त कर सकें। पुलिस के लोग सवर्ण हिंदुओं के वर्गों से भरती किए जाते है। मजिस्ट्रेटों के पद पर भी सवर्ण हिंदुओं के लोग होते है। पुलिस और मजिस्ट्रेटों के वर्ग से सवर्ण हिंदुओं का नाता सगे-संबंधी जैसा है। अस्पृश्यों के प्रति वे भी सवर्ण हिंदुओं की भांति भावनाओं और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहते है। यदि कोई अस्पृश्य किसी पुलिस अधिकारी के पास सवर्ण हिंदू के खिलाफ शिकायत दर्ज करने जाता है तो सुरक्षा के स्थान पर उसे ढेर सारी गालियां सुननी पडती है। या तो उसे शिकायत दर्ज किए बिना ही भगा दिया जाता है या रिपोर्ट ऐसी झूठी दर्ज की जाती है कि उसमे स्पृश्य हमलावरों को बच निकलने का मार्ग मिल जाता है। यदि वह मजिस्ट्रेट की अदालत में अपराधियों के खिलाफ मुकदमा दायर करता है तो उस पर क्या कार्रवाई होगी, यह पहले ही मालुम हो जाता है। किसी अस्पृश्य को कोई हिंदू गवाही देने के लिए नहीं मिलेगा, क्योंकि गांव में पहले ही षडयंत्र रच दिया जाता है कि कोई भी अस्पृश्य की हिमायत नहीं करेगा, चाहे सच कुछ भी क्यों न हो। यदि वह गवाह के रूप में अस्पृश्यों को पेश करता है तो मजिस्ट्रेट उनकी गवाही स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि वह आसानी से कह देगा कि वह तो उसी का हितैषी है, इसलिए उसे स्वतंत्र गवाह नहीं कहा जा सकता। यदि वे स्वतंत्र गवाह है भी तो मजिस्ट्रेट के सामने एक आसान-सा तरिका यह कह देना है कि उसे अस्पृश्य के पक्ष में गवाह सच्चा नहीं प्रतीत होता। वह निडर होकर ऐसा फैसला सुना देगा, क्योंकि वह भली-भांति जानता है कि उसके ऊपर कोई अदालत उसके इस फैसले को नहीं बदलेगी, क्योंकि यह एक स्थापित नियम है कि अपील सुनने वाली अदालत मजिस्ट्रेट के फैसले में दखल न दे, जो गवाहियों पर आधारित है और जिनकी उसने जांच की है। दुर्भाग्य यह है कि पुलिस कर्मचारी तथा मजिस्ट्रेट भ्रष्ट होने की अपेक्षा अधिक पक्षपातपूर्ण होते है। हिंदुओं के प्रति उनके इस पक्षपातपूर्ण और अस्पृश्यों के प्रति विरोधपूर्ण रवैये के कारण ही अस्पृश्यों को न्याय और सुरक्षा नहीं मिल पाती। पुलिस तथा मजिस्ट्रेट को अपनी प्रेरणाओं, अपने हितों और संस्कारों के कारण अस्पृश्यों की भावनाओं के साथ सहानुभुति नहीं होती। इसके फलस्वरूप वे लोग अस्पृश्यों की आकांक्षाओं के प्रति खुलकर विरोधी और विद्वेषपूर्ण हो जाते है। 

इसका सबसे अधिक बुरा पक्ष यह है कि यह सब अन्याय और अत्याचार कानून की सीमाओं के अंदर किया जा सकता है। पुलिस अपनी शक्ति और अपने अधिकार का दुरुपयोग कर सकती है। पुलिस अधिकारी ऐसी बात को दर्ज कर सकता है जो कही ही नहीं गई या ऐसी बात को दर्ज कर, जो कही गई बात से नितांत भिन्न हो, जान-बुझकर अपने रिकार्ड तोड़-मरोड़ सकता है। वह उस पक्ष को गवाहों के नाम-पते आदि बता सकता है, जिसमे उसका स्वार्थ होता है। वह किसी को गिरफ्तार करने से इंकार कर सकता है। वह किसी मामले को ख़त्म करने के लिए कुछ भी कर सकता है। वह यह सब काम पकड़े जाने के डर के बिना कर सकता है। मजिस्ट्रेट ने उसे अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह छूट दे रखी है। किसी भी मामले का निर्णय गवाहों पर निर्भर करता है, जो गवाही दे सकते है। लेकिन मुकदमे का निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि क्या गवाहियां विश्वसनीय है या नहीं। यह मजिस्ट्रेट पर निर्भर करता है कि वह किस पर विश्वास और किस पर अविश्वास करता है। वह किसी भी पक्ष पर विश्वास करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। ऐसे बहुत से मामले है, जिनमे मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक का इस्तेमाल अस्पृश्यों के हितों के खिलाफ किया है। अस्पृश्यों की गवाहियां चाहे कितनी भी सच्ची क्यों न हो, मजिस्ट्रेट सभी मामलों में एक ही बात कह देता है, 'मुझे गवाहों पर विश्वास नहीं है'। कौन-सी सजा सुनाई जाए, यह भी मजिस्ट्रेट का विवेकाधिकार है। अगर उचित न्याय नहीं हुआ है तो उचित न्याय पाने का रास्ता अपील होती है। मजिस्ट्रेट द्वारा यह कह दिया जाता है कि इस मामले में दिए गए निर्णय के खिलाफ अपील नहीं हों सकती।" 


बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर, सम्पूर्ण वाङमय खंड-10 (पृष्ठ 177-180) 

मी या परिस्थितीसाठी अप्रत्यक्षरित्या मा. गांधींना जबाबदार धरतो. कारण त्यांनी उपोषणाद्वारे ब्लैकमेल करुन पुणे करार घडवून आणला नसता तर आज अनुसूचित जाती, जमातीचे १३१ खरे नेते निर्णय प्रक्रियेत असते आणि त्यांनी सवर्ण उच्चवर्णियांच्या हातात मोक्याच्या जागा जाऊ देण्यास नक्कीच विरोध केला असता.

हिंदू ऐसा बर्बर व्यवहार क्यों करता है?

'आता कुठाय जातीवाद' असे विचारणारे जातीयवादी विचारसरणीचे लोक तुम्हाला कुठे ना कुठे मिळतीलच. म्हणूनच डॉ. आंबेडकरांचे या जातीयवादी लोकांबद्दलचे मत आणि त्याखाली अलीकडील एका बातमीची लिंक दिली आहे. त्यामुळे आता कुठेही असे होत नाही असे विचारण्याची सोय राहत नाही. 

"अस्पृश्य यदि साफ़ वस्त्र पहनता है तो उस पर अत्याचार क्यों किया जाए? हिंदू को उससे क्या आघात पहुंच सकता है? अस्पृश्य के साथ क्यों छेड-छाड की जाए, यदि वह अपने घर पर खपरैल की छत डालता है? हिंदू का उससे क्या बिगड़ता है? अस्पृश्य को क्यों पीड़ा पहुंचाई जाए, यदि वह अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहता है? उससे हिंदू की क्या हानि होती है? अस्पृश्य को क्यों विवश किया जाए कि वह मृत पशुओं को उठाए, सड़ा-गला मांस खाए और घर-घर जाकर अपने भोजन के लिए गिड़गिड़ाए? हिंदुओं को क्या घाटा होता है, यदि वह इन कामों को न करें? हिंदू को क्यों आपत्ति करनी चाहिए, यदि अस्पृश्य अपना धर्म बदलना चाहता है? उसके धर्म-परिवर्तन से हिंदू क्यों नाराज हों और बौखलाएं? हिंदू स्वयं को क्यों अपमानित अनुभव करें, यदि अस्पृश्य अपना सुंदर एवं सम्माननीय नामकरण करता है? किसी अस्पृश्य का उत्तम नाम हिंदू पर प्रतिकूल प्रभाव कैसे डाल सकता है? हिंदू को क्यों आपत्ति करनी चाहिए, यदि कोई अस्पृश्य अपने घर का द्वार मुख्य सड़क की ओर खोलता है? उससे उसका क्या बनता-बिगड़ता है? हिंदू को क्यों आपत्ति करनी चाहिए, यदि किन्ही निश्चित दिवसों पर उसके कानों तक किसी अस्पृश्य की आवाज पहुंचती है? उससे वह बहरा तो नहीं हो सकता। हिंदू को क्यों अप्रसन्नता व्यक्त करनी चाहिए, यदि कोई अस्पृश्य कोई काम करता है, प्राधिकार वाला कोई पद प्राप्त कर लेता है, भूमि खरीद लेता है, व्यापार करता है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाता है और उसकी गिनती खाते-पीते लोगों में होने लगती है? सभी हिंदू, चाहे सरकारी हो या गैर-सरकारी, मिलकर अस्पृश्यों का दमन क्यों करते है? सभी जातियां, चाहे वे आपस में लड़ती-झगड़ती रहें, हिंदू धर्म की आड़ में एकजुट होकर क्यों साजिश करती है और अस्पृश्यों को असहाय स्थिति में रखती है। 

निश्चय ही यह सब परी लोक की कथा-सी लगती है। लेकिन सबसे मजेदार बात यह है कि ये सब कारनामे वे हिंदू करते है, जो सामान्यतः भीरु होते है, यहां तक कि उन्हें कायर भी कहा जाता है। लेकिन जब हिंदू जैसे अति विनम्र लोग बेशर्मी और निर्ममता से आगजनी, लूटमार और हिंसा का सहारा लेकर पुरुषों, महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार करने लगते है, तो यह विश्वास करना पड़ता है कि निश्चय ही कोई ऐसा बाध्यकारी कारण होगा, जो अस्पृश्यों के इस विद्रोह को देखने पर हिंदुओं को पागल बना देता है और वे ऐसी अराजकता पर उतारु हो जाते है। 

निश्चय ही ऐसे विचित्र और अमानवीय व्यवहार का कोई स्पष्टीकरण तो होना चाहिए। वह क्या है? 

यदि आप किसी हिंदू से पूछेंगे कि वह ऐसा बर्बर व्यवहार क्यों करता है, क्यों वह घोर अपमान अनुभव करता है जब अस्पृश्य स्वच्छ और सम्मानजनक जीवन जीने का प्रयास करते है, तो उसका उत्तर सीधा-सा होगा। वह कहेगा, 'अस्पृश्यों के जिस प्रयास को आप सुधार कहते है, वह सुधार नहीं है। वह हमारे धर्म का घोर अपमान है।' यदि आप उससे फिर पूछेंगे कि इस धर्म की व्यवस्था कहा है तो पुनः उसका उत्तर एकदम सीधा-सा, 'हमारा धर्म हमारे शात्रों में है।' - डॉ. बी. आर. अम्बेडकर बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर, संपूर्ण वाङ्गमय, खंड-10 (पृष्ठ 181-182) 

माझा स्वराज्याला बिलकूल विरोध नाही पण त्या स्वराज्यात आम्हाला पुरेसा हिस्सा पाहिजे

माझा स्वराज्याला बिलकूल विरोध नाही पण त्या स्वराज्यात आम्हाला पुरेसा हिस्सा पाहिजे. अधिकाराच्या व माऱ्याच्या जागी आमची माणसे हक्काने आली पाहिजे. गोलमेज परिषदेमध्ये स्वतंत्र मतदारसंघासाठी मी भांडलो. स्पृश्यांनी निवडलेली माणसे आम्हाला प्रतिनिधी नकोत म्हणून मी आग्रह धरला. अखेर मी विजयी झालो व स्वतंत्र मतदारसंघ मिळविला. पण गांधींना पोटदुखी उठली. अस्पृश्यांना स्वाभिमानाचे हक्क जे मिळाले ते दुष्टपणाने हिरावून घेण्यासाठी त्यांनी आमरण अन्नसत्याग्रह केला व आपले हक्क हिरावून घेतले. त्यामुळे आपल्याला फारच कमी हक्क मिळाले. आपले सरकारी अधिकारी पाहिजेत, मंत्री पाहिजेत, मध्यवर्ती सरकारातही मंत्री पाहिजेत. असे असता ७ प्रांतात काँग्रेस मंत्रिमंडळे झाली, पण गांधींचा दृष्टिकोन बदलला नाही किंवा त्यांच्या हृदयात पालटही झाला नाही. परवा गांधींनी मद्रासचा दौरा काढला. तेथे अस्पृश्यांची व तुमची एवढी तेढ का असा एकाने प्रश्न केला. तेव्हा सरळ व स्पष्ट उत्तर न देता गांधींनी काहीतरी उडवाउडवीचे उत्तर दिले व इंग्रजांनी यांना अधिकाराची चटक लावली असे उद्गार काढले. मराठे, मुसलमान, तसेच ख्रिश्चन, ॲंग्लो इंडियनांना नोकऱ्या देतात त्याबद्दल गांधींचे काही म्हणणे नाही. फक्त अस्पृश्यांना दिल्या की त्यांच्या पोटात दुखते असा अनुभव आहे.  

- डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर. 

दि. १५ फेब्रुवारी १९४६, दहिवडी, सातारा. 

(डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर लेखन आणि भाषणे; खंड १८, भाग ३)