"ब्राम्हणों से आशा नहीं कर सकते कि वे जाति व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह करें, क्योंकि यह व्यवस्था उनको कुछ विशिष्ट विशेषाधिकार देती है और वे पदानुक्रम में अपनी विशिष्ट स्थिति और वर्त्तमान सर्वोच्चता को स्वेच्छा से नहीं छोड़ेंगे। उनसे यह आशा करना बहुत अधिक होगा कि वे अपने सभी विशेषाधिकारों को छोड़ दे जैसा कि जापान के 'सामुराइयों' ने किया था। हम गैर-ब्राम्हणों पर भी विश्वास नहीं कर सकते, और उनसे अपनी लड़ाई लड़ने को नहीं कह सकते। उनमें से बहुत से तो अभी भी जाति व्यवस्था के प्रति आसक्त है और ब्राम्हणों के हाथों की कठपुतलियां है, इन अन्य लोगों में से अधिकतर लोग, जो ब्राम्हणों की सर्वोच्चता से अप्रसन्न है, दलित वर्गों के स्तर को ऊंचा उठाने की बजाए ब्राम्हणों के स्तर को नीचा करने में अधिक रूचि रखते है, वे भी चाहते है कि लोगों का एक ऐसा वर्ग हो जिसको वे तुच्छ समझ सकें तथा उन्हें यह संतोष हो कि वे समाज के नितांत अभागे व्यक्ति नहीं है। इसका मतलब यह है कि हमें स्वयं पर विश्वास करते हुए अपनी लड़ाइयां अपने आप ही लड़नी चाहिए।"
- डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकरसंदर्भ - बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय खंड 35 (पेज 23)
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