शुक्रवार, २२ ऑक्टोबर, २०२१

गांधींचा अस्पृश्यांच्या स्वतंत्र आंदोलनाला विरोध का?

अनुसूचित जाती, जमातींनी आपलं स्वतंत्र अस्तित्व निर्माण करण्याचा प्रयत्न केला की काँग्रेसच्या सरंजामी, जातीयवाद्यांकडून त्यांना बी टीम ठरविणे ही वृत्ती काही आजची नाही. ही वृत्ती वर्णव्यवस्थेचा पुरस्कार करणा-या मा. गांधींपासून चालत आलेली आहे. डॉ. आंबेडकरांच्या काळात अस्पृश्य जेंव्हा स्वतंत्ररित्या आंदोलने करीत होते त्यावेळेस मा. गांधींची भूमिका सुद्धा अशीच होती. त्यावेळेस मा. गांधींनी जे तर्क प्रस्तुत केले ते वाचले तर मा. गांधी आणि आजचे काँग्रेसी सरंजामी, जातीयवादी यांच्यात फार मोठा काही फरक आहे असे दिसून येत नाही.

याविषयी डॉ. आंबेडकर काय म्हणतात?

"काँग्रेस-जनो और श्री गांधी ने उन अस्पृश्यों की कितनी मदद की, जो अपने लोगो के उत्थान के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहे थे। यह वह समय था, जब अस्पृश्य स्वयं संघर्ष-पथ पर थे। वे भी अपने नागरिक तथा सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए हिंदुओं के खिलाफ सविनय अवज्ञा का प्रयोग करने लगे थे। यह वह समय था, जब बंबई प्रेसिडेंसी के अस्पृश्यों ने महाड में सार्वजनिक तालाब से पानी लेने के लिए और नासिक में हिंदू मंदिर में प्रवेश के अपने अधिकार की स्थापना के लिए अपना सत्याग्रह छेड दिया था। सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ अस्पृश्यों ने जो यह सत्याग्रह आंदोलन छेडा था, उसके प्रति श्री गांधी का क्या दृष्टिकोण था? कम-से-कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि श्री गांधी का रवैया बहुत ही असंगत था।

शुरू में तो सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ अस्पृश्यों के इस सत्याग्रह की निंदा श्री गांधी ने की। उन्होंने उसका समर्थन नहीं किया। इस विवाद में अस्पृश्यों का पक्ष पुर्णतः तर्क-सम्मत था। उनका कहना था कि यदि सविनय अवज्ञा ऐसा हथियार था जिसका इस्तेमाल श्री गांधी के अनुसार हिंदू वैध रूप से स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध कर सकते है, तो इसका क्या औचित्य है कि वे दासता से अपनी मुक्ति के लिए सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। कितना सही यह तर्क था, पर श्री गांधी पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने उनके इस तर्क का उत्तर अपने तर्क से देने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि अस्पृश्यता तो हिंदुओं का पाप है। अतः प्रायश्चित्त भी हिंदुओं को ही करना चाहिए। उन्हें ही अस्पृश्यता मिटाने के लिए सत्याग्रह करना चाहिए। सत्याग्रह अस्पृश्यों का कार्य नहीं है, क्योंकि पापी वे नहीं है। वे पापी कैसे हुए, उनके प्रति तो पाप किया गया है। निश्चय ही यह अरस्तू जैसा तर्क नहीं है। यह तो महात्मा जैसा तर्क है, जिसे वाक्छल भी कह सकते है। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि महात्मा जैसा यह तर्क कोरी बकवास है। अस्पृश्यों का उत्तर था कि यदि श्री गांधी का यही दृष्टिकोण है कि सत्याग्रह एक ऐसा प्रायश्चित्त है, जिसे पापी को ही करना चाहिए, तो वह हिंदुओं से अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह करने के लिए क्यों कहते है। अंग्रेजी साम्राज्यवाद तो अंग्रेजों का पाप है। अतः उनके ही तर्क के अनुसार सत्याग्रह तो अंग्रेजों को ही करना चाहिए, न कि सवर्ण हिंदुओं को। अस्पृश्यों ने उनके तर्क को ध्वस्त कर दिया था। यह स्पष्ट हो गया था कि सवर्ण हिंदुओं के विरुद्ध अस्पृश्यों के इस सत्याग्रह के प्रति श्री गांधी के इस दृष्टिकोण में भ्रांति अथवा अनिष्ठा है। लेकिन श्री गांधी ने विरोध का जो हठी दृष्टिकोण अपना लिया था, अस्पृश्य उन्हें उससे डिगा नहीं सके।

श्री गांधी के दृष्टिकोण में एक और विसंगती है। दो स्थानों पर एक से सत्याग्रह हुए, पर उनके बारे में श्री गांधी का दृष्टिकोण अलग-अलग था। सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ अस्पृश्यों ने महाड और नासिक में सत्याग्रह किया। वैसा ही सत्याग्रह उन्होंने वाइकोम में किया। श्री गांधी ने वाइकोम सत्याग्रह का समर्थन किया। उन्होंने इसके लिए आशीर्वाद और प्रोत्साहन भी दिया। तो फिर श्री गांधी ने महाड और नासिक के सत्याग्रह का विरोध क्यों किया? क्या इन दोनों में कोई असमानता थी? हां, असमानता थी। अस्पृश्यों ने वाइकोम सत्याग्रह काँग्रेस के झंडे तले किया। अन्य दोनों सत्याग्रह अस्पृश्यों ने काँग्रेस के बिना स्वतंत्र रूप से किए। क्या श्री गांधी के विरोध का कोई वास्ता इस असमानता से था? श्री गांधी ने तो इसका कोई उत्तर नहीं दिया है। संभवतः श्री गांधी नहीं चाहते थे कि वे उन निर्बल व्यक्तियों (मेमनों) की रक्षा करे, जो उन्हें अपना रक्षक स्वीकार नहीं करते। जब श्री गांधी ने अस्पृश्यों के सत्याग्रह को आशीर्वाद प्रदान नहीं किया, तो यह अनिवार्य निष्कर्ष था कि रूढ़िवादी हिंदुओं के खिलाफ अस्पृश्यों के संघर्ष में कोई भी कांग्रेसी आगे बढकर उनकी मदद नहीं करेगा। वास्तविकता तो यह है कि श्री गांधी के इस रवैए ने ही काँग्रेसी हिंदुओं को रूढ़िवादी हिंदुओं के साथ जोड़ दिया। वे तो सगोत्र और सजातीय है। दोनों को विभाजित करने वाली रेखा भी बहुत ही महीन है। वे निस्संकोच होकर अस्पृश्यों के सिर तोड़ते-फोड़ते है। यदि विकृत नहीं तो अपने निहायत बेतुके रवैए से श्री गांधी ने केवल यही शरारत नहीं की। उन्होंने न केवल खुले आम यह कहा कि मुसलमान, ईसाई, पारसी और यहूदी कोई मदद न दे, बल्कि उन्होंने तो आपत्ति करते हुए सिखों से भी कहा, जो एक प्रकार से युद्धप्रिय और प्रोटेस्टैंट हिंदू ही है, कि वे अस्पृश्यों की मदद न करे। यहां भी उनका तर्क दुनिया से निराला था। अस्पृश्यता तो सवर्ण हिंदुओं का पाप है। उन्हें ही उसका प्रायश्चित्त करना होगा। अस्पृश्यों की मदद करना एक प्रायश्चित्त है और प्रायश्चित्त तो पापी का दायित्व है, अतः केवल पापी ही सत्याग्रह कर सकता है और उनकी सहायता कर सकता है। अस्पृश्यता के मामले में मुसलमान, ईसाई, पारसी यहूदी और सिख पापी नहीं है। अतः अस्पृश्यता-निवारण के सत्याग्रह में वे मदद नहीं दे सकते। निश्चय ही श्री गांधी ने उसे अस्पृश्यों के दृष्टिकोण से नहीं देखा। उन्होंने यह नहीं देखा कि जो सवर्ण हिंदुओं के लिए पाप है, वही अस्पृश्यों के लिए गुलामी है। यदि पापी को प्रायश्चित्त करना ही पड़ता है, तो गुलाम को भी अपनी गुलामी के बंधनो से मुक्त होने का अधिकार है और आजादी का समर्थन करने वाले हर व्यक्ती का, चाहे वह किसी भी जाती या पंथ का हो, यह अनिवार्य कर्तव्य हो जाता है कि वह बिना किसी संकोच के संघर्ष में मदद दे और उसमे भाग ले।

पर श्री गांधी इस बात के लिए तैयार नहीं हुए कि इस तर्क का लाभ अस्पृश्यों को भी मिले। वह अड़ गए। अहिंदू, हिंदू की मदद कर सकता है। हिंदू, अहिंदू की मदद कर सकता है। लेकिन किसी को भी अस्पृश्य की मदद नहीं करनी चाहिए। श्री गांधी के दोस्त आतुर थे कि उनके तर्क की कठोरता को कुछ कम किया जाए। उन्होंने कहा कि अस्पृश्यों की असुविधाओं की प्रकृति के आधार पर कोई विभेद आवश्यक है। उनका तर्क था कि अस्पृश्यों की कुछ असुविधाएं नागरिक है, कुछ धार्मिक है और जहां तक नागरिक असुविधाओं का संबंध है, अहिंदुओ को भी अनुमति दी जाए कि वे अस्पृश्यों के सत्याग्रह में उनकी मदद करें। श्री गांधी इसे भी सुनने के लिए तैयार नहीं हुए। उनका निषेधादेश सभी अवस्थाओं के लिए था और कोई भी विभेद संभव नहीं था। बाह्य सहायता संबंधी निषेध की इस तलवार से 'अस्पृश्यों के मित्र' श्री गांधी ने अस्पृश्यों की मदद की डोर ही काट दी और उन्हें युद्ध की कुमुक से पूर्णतया वंचित कर दिया।"
सन्दर्भ - डॉ. बी. आर. अम्बेडकर (बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, खंड - 10, पेज नं. 222 - 225)

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