गोलमेज संमेलनाच्या काळात देशातील सर्व मोठमोठे उद्योगपती गांधींच्या पाठीशी होते. त्यांच्या दानावरच काँग्रेसचे काम चालत होते. अस्पृश्यांचा हितशत्रू बहुतांश ब्राम्हण-ब्राम्हणेत्तर वर्ग गांधींच्या पाठीशी होता. देशातील सर्व सवर्ण चाटुकार मीडिया गांधींच्या पाठीशी होता. एवढं सगळ असूनही काही निपक्ष लोक होते जे गांधींच्या चुकीच्या वागणुकीवर बोट ठेवत होते. त्यापैकी एक त्यांचे मित्र श्री बोल्टन होते.
काय म्हणतात ते मा. गांधीबाबत?
प्रस्तुत है गोलमेज सम्मलेन में श्री गांधी की उपलब्धि के बारे में श्री बोल्टन का कथन : 'कूटनीतिज्ञ और राजनेता के रूप में श्री गांधी का क्या योगदान रहा?
मेरे विचार में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि श्री गांधी ने सम्मलेन में नया मतभेद पैदा कर दिया। उन्होंने हर भारतीय प्रतिनिधि की खिल्ली उड़ाने की बचकाना हरकत शुरू कर दी। उन्होंने उनकी ईमानदारी और उनके प्रतिनिधि स्वरूप पर अंगुली उठाई। उन्होंने उदारपंथियों पर छीटाकाशी करते हुए कहा कि वे तो कोरे सिद्धांत बघारने वाले निष्क्रिय राजनेता है और उनके कोई समर्थक नहीं है। मुस्लिमों के बारे में उन्होंने कहा कि उनसे कहीं बेहतर प्रतिनिधित्व तो मुसलमानों का वह करते है। उन्होंने दावा किया कि दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व तो वह करते है, न कि दलित वर्ग के प्रतिनिधि। अपने हर भाषण के अंत में वह यही बात बार-बार दोहराते थे और उससे घृणा-सी होने लगी थी। गैर -काँग्रेसी प्रतिनिधियों को सभी ईमानदार लोगों की ओर से धन्यवाद मिलना चाहिए कि उन्होंने श्री गांधी की इस बकवास और दंभ को सहन किया। उन्होंने न केवल श्री गांधी का बचाव करने के लिए उनसे सहयोग किया, बल्कि देश को उनकी गलती से बचाया। साथी प्रतिनिधियों के प्रति इस अभद्रता के अलावा क्या श्री गांधी उस ध्येय का समर्थन कर सके, जिसकी वकालत करने के लिए वह गए थे? वह ऐसा नहीं कर सके। उनका कार्य-संचालन अपयशकारी था। विरोध और संघर्ष के स्थान पर वह उन मामलों पर घुटने टेकने लगे, जिनके बारे में उन्हें कभी हथियार नहीं डालने चाहिए थे। वह नरेशों के आगे झुक गए और उन्होंने उनकी यह बात स्वीकार कर ली कि संघात्मक विधान-मंडल में अपने प्रतिनिधि वे स्वयं मनोनीत करेंगे। प्रतिनिधि चुने नहीं जाएंगे, जैसे कि मांग उनके प्रजा-जनों ने की थी। वह अनुदारपंथियों के आगे झुक गए और प्रांतीय स्वायत्तता से संतुष्ट होने के लिए राजी हो गए। वह इस बात के लिए सहमत हो गए कि केंद्रीय दायित्व पर आग्रह नहीं किया जाएगा, जिसके लाखो भारतीय जेल गए थे। केवल वह अल्पसंख्यको के आगे नहीं झुके। यही वह एकमात्र पक्ष था, जिसके आगे वह झुक सकते थे और अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा सकते थे तथा देश का भला कर सकते थे।
श्री गांधी की प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने में सबसे अधिक योगदान गोलमेज सम्मलेन में उनकी भागीदारी ने किया। जिस भूमिका को निभाने का दायित्व उन्होंने लिया, उसके लिए वह उपयुक्त नहीं थे। किसी भी देश ने कभी भी संविधान-रचना के लिए ऐसा प्रतिनिधि नहीं भेजा था, जिसे न तो पूरा प्रशिक्षण मिला था, और न ही उसने पूरा अध्ययन किया था। गोलमेज सम्मलेन में श्री गांधी अपनी जुबान पर संत नरसी मेहता का गीत लेकर गए। उनके लिए और देश के लिए बेहतर तो यही होता कि वह अपने साथ तुलनात्मक संवैधनिक विधि का एक ग्रंथ ले जाते। जिस विषय का निपटारा उन्हें करना था, उसका ज्ञान उन्हें नहीं था। अत: वह इस बारे में नितांत असमर्थ और असहाय थे कि वह ब्रिटिश प्रस्तावों का खंडन कर सके या उनके जबाब में अपने वैकल्पिक प्रस्ताव रख सके। तो इसमे अचरज कैसा, यदि अपने भक्तों की टोली से बिछुड़े और राजनेताओं के चक्कर में फंसे श्री गांधी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। हर मोड़ पर उन्होंने गड़बड़ी की और जब देखा कि उससे भी काम नहीं चलेगा तो वह हताश होकर भारत लौट आए।
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