शुक्रवार, २२ ऑक्टोबर, २०२१

वर्ण व्यवस्था के बारे में मा. गांधी के विचार

 वर्ण-धर्म में हर वर्ण को अपना अपना काम धर्म समझकर करना है। पेट भरना तो इसका थोड़ा सा फल है। यह मिले या न मिले तो भी चारों वर्ण कों अपने अपने धर्म में लगा रहना चाहिए।

शुद्र का तो कहना ही क्या? और अगर किसी भी तरह मुकाबिला किया जा सकता है तो शुद्र सिर्फ धर्म समझकर सेवा ही करता है। जिसके पास कोई जायदाद कभी होनेवाली ही नहीं और जिसे मालिक बनने का लालच तक नहीं, वह हजार नमस्कार के लायक है और सबसे ऊंचा है। धर्म पर चलने वाला शुद्र अपने बारे में ऐसा न समझेगा, लेकिन देवता तो उसपर फूल बरसाएंगे।

अब रोटी-बेटी व्यवहार के बारे में जाँच करे। मैं मानता हूँ कि एकराष्ट्रीयता या कौमियत भावको फैलाने के खातिर एक थाली में खाना या चाहे जिसके साथ शादी करने की छूट लेना जरुरी नहीं है।
- मा. गांधी

वर्ण यानी इंसानके धंदे का चुनाव का पहलेसे किया हुआ फैसला। आदमी अपने गुजारे के लिए बापदादोंका ही पेशा करे, इसका नाम वर्ण-धर्म.
- मा. गांधी

शुद्र को ज्ञान पाने का उतना ही हक़ है जितना ब्राम्हण को। लेकिन वह अपना गुजारा लोगो को लिखा-पढ़ाकर करने की कोशिश करे, तो वह जरूर वर्ण-धर्म से गिर जाएगा। बाप दादा का धंदा ही उसकी पसंद का अकेला धंदा होना चाहिए। यह पेशा पसंद करने में कोई बुराई नहीं। उलटे इसमे कुलीनता है। आज हम सतरंगे आदमी देखते है। इसीसे समाज में हिंसा फैली हुई है और समाज तितर-बितर हो गया है। बापका धंदा करने वाले बढई के लडके हजारो होंगे, जबकि वकिलका धंदा करने वाले बढई के छोकरे शायद सौ भी न हो।
- मा. गांधी

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