शुक्रवार, २२ ऑक्टोबर, २०२१

पूना समझौते का परिणाम

 पूना समझौते का परिणाम

- डॉ. बी. आर. अम्बेडकर

इतना कहना काफी होगा कि भले ही श्री गांधी ने आमरण अनशन किया, पर वह मरना नहीं चाहते थे। वह तो ज़िंदा रहना चाहते थे।

आमरण अनशन श्री गांधी का एक बड़ा दांव था। संभवत उनका विचार था कि केवल आमरण अनशन की धमकी से मै और दलित वर्ग के मेरे साथी घबराकर झुक जाएंगे। लेकिन शीघ्र ही उन्हें पता चल गया कि उनका अनुमान सही नहीं था और अस्पृश्य भी अपने अधिकारों के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने के लिए उतने ही कृत-संकल्प थे। उनके अपने अनुयायियों के अलावा अन्य किसी को भी इस बारे में संतोष नहीं था कि श्री गांधी के अनशन का कोई नैतिक अधिकार था। यदि श्री गांधी को नया जीवन-दान मिला तो उसका पूरा श्रेय उनके प्रति अस्पृश्यों की उदारता और सद्भावना को जाता है।

पूना समझौता करने से अस्पृश्यों को क्या लाभ हुआ इसे समझने के लिए हमें विधान-मंडलों के लिए हुए चुनावों के परिणामों की निरख-परख करनी ही होगी। जहा तक अस्पृश्यों का संबंध है, फरवरी 1937 में जो चुनाव हुए, वे पूना समझौते के अनुसार हुए। इसमे विभिन्न प्रांतीय विधान-मंडलो में अस्पृश्यों के लिए आरक्षित 151 सीटों में से 78 सीटें काँग्रेस को मिली।

प्रश्न उठता है कि पूना समझौता करने से और श्री गांधी के प्राणों की रक्षा करने से क्या अस्पृश्यों के हाथ कोई काम की चीज लगी है और क्या पूना समझौते से अस्पृश्य लोग हिंदुओं के दास नहीं बन गए है?

विश्लेषण से पता चलता है कि उनमे से अधिकतर कांग्रेसियों के रूप में चुने गए है। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि अस्पृश्यों के लिए काँग्रेस में या उस प्रयोजन के लिए किसी विशाल राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाना उनके लिए घातक ही सिद्ध होगा।

अस्पृश्यों को आंदोलन करना होगा, यदि वे अपनी गलतियों के प्रति सचेत रहना चाहते है, यदि वे अपने बीच विद्रोह की भावना को जीवित रखना चाहते है। उन्हें आंदोलन करना होगा, क्योंकि उन्हें हिंदुओं को जताना होगा कि जो अस्पृश्यों के लिए त्रासदी है, वही सवर्ण हिंदुओं के लिए अपराध है।

काँग्रेस के भीतर अस्पृश्यों का आंदोलन हो ही नहीं सकता। निश्चय ही इसका अर्थ होना चाहिए, पार्टी के भीतर ही भयंकर संघर्ष। लेकिन काँग्रेस अपनी रक्षा के लिए अस्पृश्यों को आंदोलन की अनुमति नहीं दे सकती।

काँग्रेस में शामिल होने वाले अस्पृश्यों पर काँग्रेस ने यह कड़ी पाबंदी लगा दी है कि वे अस्पृश्यों का ऐसा कोई स्वतंत्र आंदोलन नहीं चला सकते, जिसकी अनुमति उच्च कमान ने न दी हो। नतीजा यह है कि जिन प्रांतों में अस्पृश्य काँग्रेस में शामिल हो गए है, वहां अस्पृश्यों का आंदोलन वस्तुतः ठप्प हो गया है।

अस्पृश्यों को विधान-मंडल में बोलने और काम करने की आजादी होनी ही चाहिए, यदि उन्हें अपनी शिकायतों को व्यक्त करना है और राजनीतिक कार्यवाही से अपनी पीडाओं को दूर करना है। लेकिन अस्पृश्यों के जो प्रतिनिधि काँग्रेस में शामिल हो गए है, उन्होंने बोलने और काम करने की इस आजादी को गंवा दिया है। अपनी इच्छा के अनुसार न वे वोट दे सकते है और न ही बोल सकते है। न वे प्रश्न कर सकते है और न ही वे कोई संकल्प या विधेयक प्रस्तुत कर सकते है। वे पूर्णतया काँग्रेस कार्यकारिणी के नियंत्रण में रहते है। उन्हें केवल उतनी ही स्वतंत्रता मिलती है, जीतनी कि काँग्रेस कार्यकारिणी उन्हें देना चाहे। नतीजा यह है कि भले ही अस्पृश्यों की विपदाए दिनों-दिन बढती ही जा रही हो, पर विधान-मंडल के अस्पृश्य सदस्य उनके बारे में एक सवाल तक नहीं उठा सकते। उनकी दशा इतनी दयनीय हो गई कि काँग्रेस पार्टी कभी-कभी तो उनसे ऐसे विधेयक के खिलाफ वोट देने की अपेक्षा करती है, जो विधान-मंडल के अस्पृश्य सदस्यों की राय में अस्पृश्यों के लिए हितकर हो। अस्पृश्यों के प्रतिनिधि अस्पृश्यों के हितों के रखवाले समझे जाते है। लेकिन काँग्रेस में शामिल हो जाने के कारण उनकी स्थिति मुख पर पट्टी बंधे कुत्तो जैसी हो गई है। काटना तो दूर की बात है, वे भौक भी नहीं सकते। इन अस्पृश्य सदस्यों ने बोलने और काम करने की जो आजादी गंवा दी है, उसका केवल एक ही कारण है कि वे काँग्रेस में शामिल हो गए है और काँग्रेस के अनुशासन के फंदे में फंस गए है।

काँग्रेस में शामिल हो जाने से अस्पृश्यों को तीसरा नुकसान यह हुआ है कि वे अस्पृश्यों को कोई वास्तविक लाभ नहीं पहुंचा सके है। इसके दो कारण है। एक तो यह कि काँग्रेस कोई आमूल परिवर्तनवादी पार्टी नहीं है। कोई क्रांतिकारी पार्टी आमूल परिवर्तनवादी पार्टी भी है या नहीं, यह निश्चय ही उन सामाजिक तथा भावनात्मक वास्तविकताओं पर निर्भर करता है, जो क्रांति की प्रेरणा देती है। यह सच है कि काँग्रेस ने जनता-जनार्दन का भारी समर्थन प्राप्त किया, लेकिन ऐसा उन्होंने सभी भारतीयों में व्याप्त अंग्रेज-विरोधी भावना को उकसा कर किया। यह भी सच है कि ये भावनाएं भूखे और आजादी से वंचित लोगों की भावनाएं थी। लेकिन उनकी भावनाओं का सामाजिक रूप से उन्नत तथा धनवान वर्गों की भावनाओं से विरोध था। और यह उन्नत वर्ग काँग्रेस में सदा ही शासक वर्ग रहा है। यही कारण है कि काँग्रेस केवल क्रांतिकारी संस्था रही है, आमूल परिवर्तनवादी पार्टी नहीं। जो भी सावधानी से काँग्रेसी सरकारों के कारनामों पर विचार करेगा, वह इस सत्य को देख सकता है। जब से उन्होंने सत्ता संभाली है, तब से उनकी उपलब्धि बस यही है कि वे सस्ती चीजों का फुटकर संग्रह कर सके है। अंग्रेजो से भी कही अधिक तत्परता से उन्होंने श्रमिकों को गोलियों से भूना है और उच्च न्यायालयों द्वारा दंडित अपराधियों को रिहा किया है। रिहाई का केवल यही आधार है कि उन्हें रिहा करने का अधिकार है। मुझे आश्चर्य है कि काँग्रेस ने इतनी जल्दी यह दिखा दिया है कि वे तो इंग्लैंड के टोरियो (अनुदारवादियों) के प्रतिरूप ही है। काँग्रेस के शासक वर्ग की क्रांति का, यानी अंग्रेज को खदेड़ने का समूचा जोश ठंडा पड़ गया है। अब जब उन्हें जनता के शोषण का मौक़ा मिल गया है तो वे भरपूर शोषण के लिए सत्ता और अधिकार से चिपके रहना चाहते है। वे नहीं चाहते कि साम्राज्य-विरोध का कोई विचार उनके काम में खलल डाले।

सामाजिक तथा आर्थिक पुनर्निर्माण के आमूल परिवर्तनवादी कार्यक्रम के बिना अस्पृश्य कभी अपनी दशा में सुधार नहीं कर सकते। चुकी काँग्रेस आमूल परिवर्तनवादी पार्टी नहीं है, अत: उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता कि वह ऐसा कोई कार्यक्रम हाथ में लेगी। अस्पृश्यों के ऐसी पार्टी में शामिल होना बेकार और बेमानी है। काँग्रेस उनके लिए कुछ भी नहीं करेगी। उल्टे वह पहले की भांति उनका दुरुपयोग करेगी।

काँग्रेस में शामिल होने से अस्पृश्यों को ऐसे नुकसान हुए है। वे केवल नुकसान ही नहीं है। मैं तो उन्हें घोर दुष्परिणाम कहता हूँ। समूची सामाजिक गतिविधि ठप्प हो गई है। समूचे राजनीतिक अधिकार छिन गए है। वस्तुतः उन्हें जंजीरों से जकड दिया गया है।

लेकिन निश्चय ही यह प्रश्न पूछा जाएगा कि यदि काँग्रेस शामिल होने के ऐसे दुष्परिणाम है, तो ये अस्पृश्य उसमे शामिल क्यों हुए? काँग्रेस के विरोध में उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव क्यों नहीं लड़े? जिन कुछ अस्पृश्यों ने काँग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा, वे केवल स्वार्थजीवी लोग थे और कुछ बनने की चाह रखते थे। विधान-मंडल में इसलिए जाना चाहते थे कि जब लाभ के पद बांटे जाएं, तो उनका भी नंबर आ जाए। उन्हें इसकी परवाह नहीं थी कि किसके समर्थन से वे वहां पहुंचे। काँग्रेस सबसे बडी पार्टी थी और उसका टिकट विधान-मंडल में पहुंचाने का सर्वाधिक निश्चित उपाय था। अत: इन स्वार्थजीवियों को लगा कि काँग्रेस में शामिल होना चुनाव में सफल होने का सबसे आसान तरीका था। वे अवसर नहीं खोना चाहते थे। इससे उनका प्रयोजन तो स्पष्ट हो जाता है, पर इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि किस कारण से विवश होकर वे काँग्रेस में शामिल हुए। मुझे यकीन है कि वे स्वार्थजीवी भी काँग्रेस में शामिल न होते, यदि वे काँग्रेस के सहारे के बिना चुनाव में सफल हो सकते। वे काँग्रेस में ही शामिल हुए, क्योंकि उन्होंने देखा कि स्वतंत्र मार्ग असंभव था। वे काँग्रेस में शामिल होने पर विवश क्यों हुए? उत्तर है कि यह सब अनिष्ट संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र प्रणाली के कारण हुआ, जो पूना समझौते की उपज थी।

यदि अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के लिए संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र हो, तो निश्चय ही अल्पसंख्यकों का अनिष्ट होगा। अल्पसंख्यकों द्वारा खड़ा किया उम्मीदवार फिर भी सफल  नहीं हो सकता, यदि समूचे अल्पसंख्यक एकजुट होकर उसका समर्थन भी करें। यदि अल्पसंख्यकों के लिए सीट आरक्षित कर दी जाती है तो उससे केवल यह सुरक्षा मिलती है कि अल्पसंख्यकों का उम्मीदवार निर्वाचित हो जाएगा। लेकिन उससे यह गारंटी नहीं मिलती कि चुनाव जीतने वाला अल्पसंख्यकों का उम्मीदवार उनका चहेता उम्मीदवार होगा, यदि चुनाव संयुक्त निर्वाचन-क्षेत्र प्रणाली से होगा। भले ही किन्ही अल्पसंख्यकों के लिए सीट आरक्षित कर दी जाए, पर बहुमत सदा ही अपने मर्जी के किसी अल्पसंख्यक को चुन सकता है और उसे अल्पसंख्यकों के उम्मीदवार के खिलाफ आरक्षित सीट के लिए खड़ा कर सकता है और अपनी फालतू मतदान- शक्ति के बल पर अपने मनोनीत उम्मीदवार को जिता सकता है। नतीजा यह होता है कि आरक्षित सीट के लिए चुना गया अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधि अल्पसंख्यकों का पक्षधर न होकर वास्तव में बहुमत का गुलाम हो जाता है।

- डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर, सम्पूर्ण वाङ्गमय, खंड-10 (पृष्ठ 263 -267)

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