सोमवार, १४ जून, २०२१

भारतातील पत्रकारीता

खालील विचार वाचले तर तुम्हाला असे वाटेल की देशात आज पत्रकारीतेच्या नावाने जे काही चालले आहे त्याबद्दल कोणीतरी आपले विचार प्रकट केले आहेत. १८ जानेवारी १९४३ ला बाबासाहेबांनी तेव्हाच्या पत्रकारितेबद्दल एका भाषणात मांडलेले विचार. आणि आज जी पत्रकारिता दिसून येत आहे त्याला हे विचार अगदी तंतोतंत लागू पडत आहेत. 

'कभी भारत में पत्रकारिता एक व्यवसाय था।अब वह व्यापार बन गया है। वह तो साबुन बनाने जैसा है, उससे अधिक कुछ भी नहीं। उसमें कोई नैतिक दायित्व नहीं है। वह स्वयं को जनता का जिम्मेदार सलाहकार नहीं मानता। भारत की पत्रकारिता इस बात को अपना सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि कर्तव्य नहीं मानती की वह तटस्थ भाव से निष्पक्ष समाचार दे, वह सार्वजनिक निति के उस निश्चित पक्ष को प्रस्तुत करे जिसे वह समाज के लिए हितकारी समझे, चाहे कोई कितने भी उच्च पद पर हो, उसकी परवाह न किए बिना किसी भय के उन सभी को सीधा करे और लताड़े, जिन्होंने गलत अथवा उजाड पथ का अनुसरण किया है। उसका तो प्रमुख कर्तव्य यह हो गया है की नायकत्व को स्वीकार करें और उसकी पूजा करे। उसकी छत्रछाया में समाचार-पत्रों का स्थान सनसनी ने, विवेक-सम्मत मत का विवेकहीन भावावेश ने, उत्तरदायी लोगों के मानस के लिए अपील ने, दायित्वहीनों की भावनाओं के लिए अपील ने ले लिया। लार्ड सेलिसबरी ने नार्थक्लिप पत्रकारिता के बारे में कहा है की वह तो कार्यालय-कर्मचारियों के लिए कार्यालय-कर्मचारियों का लेखन है। भारतीय पत्रकारिता तो उससे भी दो कदम आगे है। वह तो ऐसा लेखन है, जैसे ढिंढोरचियों ने अपने नायकों का ढिंढोरा पिटा हो। नायक-पूजा के प्रचार-प्रसार के लिए कभी भी इतनी नासमझी से देशहित की बलि नहीं चढाई गई है। नायकों के प्रति ऐसी अंधभक्ति तो कभी देखने में नहीं आई, जैसी की आज चल रही है। मुझे प्रसन्नता है की आदर योग्य कुछ अपवाद भी है। लेकिन वे ऊंट के मुंह में जीरे के समान है और उनकी बातों को सदा ही अनसुना कर दिया जाता है। समाचार-पत्रों की वाहवाही का कवच धारण करके इन दोनों महानुभावों की प्रभुत्व जमाने की भावना ने तो सभी मर्यादाओं को तोड़ डाला है। अपने प्रभुत्व से उन्होंने न केवल अनुयायियों को, बल्कि भारतीय राजनीति को भी भ्रष्ट किया है। अपने प्रभुत्व से उन्होंने अपने आधे अनुयायियों को मुर्ख तथा शेष आधों को पाखंडी बना दिया है। अपनी सर्वोच्चता के दुर्ग को सुदृढ़ करने में उन्होंने 'बड़े व्यापारिक घरानों' तथा धन-कुबेरों की सहायता ली है। हमारे देश में पहली बार पैसा संगठित शक्ति के रूप में मैदान में उतरा है।' 
- डॉ. बी. आर. अम्बेडकर

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