उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में हम दो घटनाओ का उल्लेख करेंगे। एक बाली से संबंधित है और दूसरी उनकी पत्नी सीता से। सर्वप्रथम हम बाली को लें।
बाली और सुग्रीव दो भाई थे। वे वानर जाती से संबंध रखते थे और एक राज-परिवार से थे। उनका अपना राज था जिसकी राजधानी किष्किंधा थी। जब बाली राजा था तो उसका मायावी नामक राक्षस से युद्ध छिडा हुआ था। द्वंदयुद्ध मे मायावी अपनी जान बचाकर भागा और एक गहरी खोह में घुस गया। बाली ने सुग्रीव से कहा की वह गुफा के भीतर जा रहा है, वह बाहर गुफा के मुंह पर प्रतीक्षा करे। कुछ देर बाद गुफा से रक्त की धारा फूटी। सुग्रीव ने अनुमान लगाया की बाली मायावी के हाथो मारा गया। किष्किंधा आकर उसने स्वयं को राजा घोषित कर दिया और हनुमान को अपना मंत्री बना लिया।
वास्तव में बाली मरा नहीं था बल्कि बाली ने मायावी को मार गिराया था। बाली गुफा से बाहर आया और देखा तो सुग्रीव वहा नहीं था। वह किष्किंधा आया तो यह देखकर चकित रह गया की सुग्रीव राजा बना बैठा है। स्वाभाविक था की इस दगाबाजी को देखकर बाली आगबबूला हो उठता, क्योंकि इसका कारण भी स्पष्ट था। सुग्रीव को अटकल पर ही निर्भर नहीं करना था। उसे देखना था की बाली मृत है या जीवित। दूसरे बाली का एक पुत्र था अंगद। वह बाली का वैध उत्तराधिकारी था। उसे राजा बनाया जाना चाहिए था। सुग्रीव ने कुछ नहीं किया। यह विद्रोह का स्पष्ट मामला था। बाली ने सुग्रीव को खदेड़ दिया और गद्दी पर बैठ गया। दोनों भाई जानी दुश्मन बन गए।
यह घटना तभी घटी थी, जब रावण ने सीता का हरण किया था। राम और लक्ष्मण उनकी खोज कर रहे थे। सुग्रीव और हनुमान किसी मित्र की तलाश में थे, जो उन्हें बाली से राज्य वापस दिला सके। दोनों पक्षों में संयोगवश भेंट हो गई। जब दोनों ने एक-दूसरे की कठिनाईयों को सूना तो उनके बिच एक समझौता हुआ। यह सहमति हुई की राम बाली का वध करने और सुग्रीव को किष्किंधा-राज दिलवाने में मदद करे। यह भी सहमति हुई की सुग्रीव और हनुमान राम को सीता वापस दिलाने में सहायता करेंगे। बाली वध की योजना को कार्यरूप देने के लिए सुग्रीव अपने गले में माला पहन ले, जिससे द्वंदयुद्ध के समय सरलता से पहचाना जा सके। राम किसी वृक्ष की आड़ में छिप जाए और वहा से तीर चलाकर बाली का काम तमाम कर दे। तद्नुसार द्वंद आयोजित किया गया। जब युद्ध हो रहा था तो सुग्रीव के गले में माला थी। वृक्ष के पीछे छिपे राम ने निशाना साधा। सुग्रीव किष्किंधा का राजा बन गया। बाली की हत्या राम के चरित्र पर बहुत बड़ा धब्बा है। यह एक ऐसा अपराध था, जो एकतरफा था क्योंकि बाली का राम से कोई विवाद नहीं था। यह कायरता भी थी क्योंकि बाली निहत्था था। यह एक पूर्वनियोजित और सुविचारित हत्या थी।
अब यह देखे की उन्होंने अपनी ही पत्नी सीता के साथ क्या व्यवहार किया। जब सुग्रीव और हनुमान ने सेना एकत्र कर ली तो राम ने लंका पर आक्रमण कर दिया। यहा भी राम ने वही चाल चली जो बाली और सुग्रीव के बिच चली थी। उन्होंने इस शर्त पर रावण के भाई विभीषण से सहायता ली की रावण और उसके पुत्रो को मार विभीषण को राज दे दिया जाएगा। राम ने रावण और पुत्र इंद्रजीत का वध कर दिया। युद्ध समाप्ति पश्चात विभीषण का राज्याभिषेक कराया गया। तब उन्होंने हनुमान को सीता के पास भेजा और सूचित कराया की वे, लक्ष्मण और सुग्रीव सकुशल है और उन्होंने रावण का संहार कर दिया है।
रावण पर विजय प्राप्त करने के उपरांत उन्हें सीधे सीता के पास जाना चाहिए था। उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्हें राजतिलक की ज्यादा चिंता है, सीता की नहीं। यहा तक की राजतिलक के पश्चात भी वे स्वयं न जाकर हनुमान को भेजते है। और वह संदेश क्या देते है? वे हनुमान को सीता को लाने के लिए नहीं कहते। वह सिर्फ यह खबर भेजते हैं की वे स्वस्थ और प्रसन्न है। यह सीता है जो हनुमान से राम से मिलने की बात कहती है। राम सीता से मिलने गए ही नहीं जो उनकी पत्नी थी, जिसका रावण ने अपहरण कर लिया था और उसे दस माह कैद में रखा था। सीता उनके पास लाई गई। जब सीता राम से मिली तो राम ने क्या कहा? इस बात पर कोई यकीन नहीं करेगा की आदमी में साधारण मानवीय दया भी न हो। जो दुख में घिरी अपनी पत्नी से कठोर वचन बोलेगा जैसे की राम ने बोले जब वह लंका में उससे मिले। वाल्मीकि साधिकार रामायण में कहते है; जैसा की राम ने कहा: (युद्धकाण्ड सर्ग 115, श्लोक 1.23)
"मैंने अपने शत्रु, तुम्हारे अपहर्ता को युद्ध में परास्त कर तुम्हे इनाम के तौर पर पाया है। मुझे मेरा सम्मान मिल गया और दुश्मनो को हरा दिया है। मुझे परिश्रम का फल मिल गया है तथा लोगों ने मेरी सैनिक शक्ति देखी।
मैं अपनी अपकीर्ति मिटाने आया था। मैंने तुम्हारे लिए यह कष्ट थोड़े ही उठाया है।"
राम के सीता के प्रति किए गए इस व्यवहार से बड़ी क्या कोई और भी कठोरता हो सकती है? वे यही नहीं रुके। उन्होंहे आगे कहा:
"मुझे तुम्हारे चरित्र पर संदेह है। रावण ने तुम्हारा शीलभंग किया होगा। मुझे तुम्हे देखते ही उबाल आ रहा है। मैं तुम्हे स्वतंत्र करता हूँ। जहा मन करे जाओ। हे जनक सुता! मुझे तुमसे कोई लेना-देना नही। मैंने तुम्हे जीता, इसका मुझे संतोष है। यही मेरा लक्ष था। मैं यह नहीं सोच सकता की तुम जैसी सुन्दर नारी से रावण ने आनन्द नहीं लूटा होगा।"
स्वाभाविक है की सीता उन्हें पतित और क्षुद्र कहती और स्पष्ट रूप से कहती की जब हनुमान आए थे, यदि तभी उन्हें यह संदेश भिजवा दिया गया होता की अपहरण के कारण राम ने उन्हें मन से निकाल दिया है तो वे आत्महत्या कर लेती और उन्हें यह कष्ट नहीं उठाना पड़ता। उन्हें कोई अवसर दिए बिना सीता ने अपनी पवित्रता का प्रमाण दिया। वे अग्नि-परीक्षा में सफल हुई। इससे देवता प्रसन्न हुए और इस परीक्षा के पश्चात उन्होंने सीता को पवित्र घोषित कर दिया। इसके पश्चात ही राम सीता को अयोध्या ले जाने के लिए सहमत हुए। और जब वे उन्हें अयोध्या ले आए तो उन्होंने उनके साथ कैसा व्यवहार किया? वे राजा बन गए और सीता रानी। परन्तु राम तो राजा बने रहे और सीता का यह पद जल्दी ही छीन गया। यह काण्ड राम की सबसे बड़ी अपकीर्ति है। वाल्मीकि रामायण में कहा गया है की राम के राजतिलक के कुछ पश्चात ही सीता गर्भवती हो गई। ऐसा सुनकर की सीता गर्भवती है, दृष्ट प्रवृत्ति के लोगों ने विषवमन किया की ऐसा लगता है की सीता जब लंका में थी तो वे रावण से गर्भवती हुई। उन्होंने राम पर आक्षेप लगाया की वे एक ऐसी स्त्री को पत्नी के रूप में वापस ले आए। इस कानाफूसी को राम की राज्यसभा का विदूषक भद्र महल में लेकर आया। राम स्वाभाविक रूप से ऐसे लांछन को सुनकर स्तंभित रह गए। वे जुगुप्सा से भर उठे। यह स्वाभाविक भी था। प्रश्न यह था की इस अपयश से किस प्रकार मुक्ति पाई जाए? इस कलंक से मुक्ति का उन्हें सरलतम उपाय यह मिला की सीता को त्याग दिया जाए। एक स्त्री को, जो गर्भावस्था में है, न कोई दासी, साधनो के बिना जंगलो में छोड़ देना और वह भी उसे पूर्वसूचना दिए बिना! इसमे कोई संदेह नहीं की सीता को अचानक त्याग देने का विचार ही उनके मन में न आया होगा। विचार उत्पन्न होने और उसके पनपने और कार्यरूप देने की योजना बनाने में कुछ समय अवश्य लगा होगा। जब भद्र ने उन्हें नगर में होने वाली अफवाहों के विषय में बताया तो उन्होंने अपने भाइयों को बुलाया और उन्हें अपनी भावनाए बताई। राम ने कहा "सीता की पवित्रता और सतीत्व लंका में ही प्रमाणित हो चुके थे। देवो ने भी इसका अनुमोदन किया था और उन्हें सीता की सच्चाई, पवित्रता और सतीत्व पर विश्वास है।" इसके बावजूद प्रजा सीता पर लांछन लगाती है और मुझ पर उंगली उठाती है। ऐसा अपमान कोई नहीं सह सकता। सम्मान सबसे बड़ी सम्पत्ति है। देवता और महापुरुष उसे क्षति नहीं पहुचने देते। मैं यह अपमान और अपकर्ष नहीं सह सकता। ऐसी अपकीर्ति से बचने के लिए मैं तुम्हे भी छोड़ सकता हूँ। ऐसा न समझना की मैं सीता को त्यागने में संकोच करूँगा।"
इससे पता चलता है की उन्होंने सीता को त्यागने का मन बना लिया था, यह विचार किए बिना की जो वे कर रहे है, वह सही है या गलत। उन्होंने प्रजा के लांछनो से बचने का सरलतम उपाय ही अपनाया। सीता के जीवन का कोई मूल्य नहीं। मूल्य था तो उनकी प्रतिष्ठा का। उन्होंने प्रजा में ऐसी अफवाहे रोकने का कोई प्रयत्न नहीं किया, जो एक राजा के रूप में उनका कर्तव्य था, जो एक स्त्री के पति के रूप में उनका दायीत्व था जिसकी वे परीक्षा ले चुके थे। वे प्रजा की कानाफूसी के आगे झुक गए। हिंदुओ में ऐसे लोगो का अभाव नहीं है, जो यह प्रमाणित करने की चेष्टा करते है की राम एक प्रजातांत्रिक राजा था। किन्तु ऐसे लोग भी पर्याप्त संख्या में है जो उन्हें दब्बू और भीरु मानते है।
अपनी प्रतिष्ठा के रक्षा की यह क्रूर योजना उन्होंने अपने भाइयों को तो बता दी किन्तु सीता को नहीं बताई; जिनसे उनका प्रत्यक्ष संबंध था। क्योंकि वही प्रभावित होनी थी तो उन्ही को बताया जाना चाहिए था। परन्तु उन्हें पूर्ण अंधकार में रखा गया। राम सीता से उस रहस्य को छिपाए रहे, जब तक उस पर पालन न हो गया। सीता के दुर्भाग्य से वह समय भी आया, जब उनकी प्रतीक्षित योजना क्रियान्वित हुई। जो स्त्रीया गर्भवती होती है, उनके मन में छोटी-मोटी ललक हुआ करती है। राम यह जानते थे। इसलिए एक दिन उन्होंने सीता से पूछा की तुम्हारा किसी वस्तु को मन तो नहीं करता है। उन्होंने कहा, 'हाँ' करता है। राम ने पूछा 'वह क्या है।' सीता ने कहा, 'वह गंगा किनारे किसी ऋषि के आश्रम में कंद-मूल खाकर कम से कम एक रात बिताना चाहती है।' राम को और क्या चाहिए था। तपाक से हां भर दी, "निश्चिन्त रहो प्रिय! मेरी कोशिश होगी की तुम्हे कल ही भेज दूँ।" सीता ने इसे सीधे स्वभाव से लिया। परन्तु राम ने क्या किया? उन्होंने सोचा सीता से पिण्ड छुडाने का यह अच्छा अवसर है। उन्होंने अपने भाइयों से कहा की वे सीता के संबंध में बिच में न आए और यदि आते है तो शत्रु समझे जाएंगे। तब उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "वह सवेरे ही सीता को गंगा के किनारे जंगल में आश्रम में छोड़ आएं।" लक्ष्मण किंकर्तव्यविमूढ़ थे की सीता को राम का फैसला कैसे बताएं? उनकी मनोदशा को पहचानते हुए राम ने, लक्ष्मण को बताया की सीता ने स्वयं ही इच्छा प्रकट की है की वे कुछ समय आश्रम में गंगा किनारे बिताना चाहती है। इससे लक्ष्मण को थोड़ा ध्येर्य बंधा। यह दुरभिसंधी रात को हुई थी। सवेरे कही लक्ष्मण ने सुमंत से कहा की वह रथ के घोड़े तैयार करें। सुमंत ने लक्ष्मण को बताया की सब तैयार है। तब लक्ष्मण रनिवास में गए और सीता से मिले की वे कुछ दिन आश्रम में बिताना चाहती है। राम ने अपना वायदा निभाते हुए, उनसे ऐसा करने को कहा है। उन्होंने कहा, 'वह रथ खड़ा है चलिए।' सीता राम का आभार मानकर रथ पर चढ़ गई। लक्ष्मण और सीता को बिठाकर सुमंत निर्दिष्ट स्थान की और चल दिए। अंत में वे गंगा के किनारे पहुँच गए, केवटों ने उन्हें पार उतार दिया। लक्ष्मण सीता के चरणो में गिर पड़े और आँखों से गर्म-गर्म आंसू टपकाते हुए कहा - "हे निर्दोष रानी! मेरी करनी पर मुझे क्षमा करो। मुझे आदेश है की मैं तुम्हे यही छोड़ जाऊं क्योंकि लोग आपके कारण राम पर आक्षेप करते है।"
राम ने सीता को त्याग दिया और उनके हाल पर जंगल में छुडवा दिया। सीता ने वही जुडवा पुत्रों लव और कुश को जन्म दिया। तीनो वाल्मीकि के यहाँ रहने लगे। वाल्मीकि ने बालको का लालन-पालन किया और उन्हें रामायण की कथा गायन सिखाया, जो उन्होंने स्वयं रची थी। राम के राज्य के पास ही वे बालक 12 वर्ष तक जंगलो में ऋषि के आश्रम में पलते रहे। आदर्श पति और प्रिय पिता ने यह जानने की कभी चेष्टा नहीं की सीता जीवित है या मर ही गई। राम 12 वर्ष पश्चात सीता से अदभुत दशा में मिले। राम ने एक यज्ञ किया और उसमे सभी ऋषियो को भाग लेने के लिए बुलाया। राम ने जान बुझकर वाल्मीकि को, आमंत्रित नही किया। परन्तु वाल्मीकि अपनी ओर से ही सीता के दोनों पुत्रो को, अपने शिष्यों के साथ लेकर यज्ञ में पहुँच गए। जब यज्ञ चल रहा था तो दोनों बालको ने सभा में रामायण का गायन आरम्भ किया। राम बड़े आनंदित हुए और बालको के विषय में पूछा तो बताया गया की वे सीता के पुत्र है। तब उन्हें सीता की याद आई परंतु फिर भी उन्होंने क्या किया? वे सीता के पास नहीं गए। उन्होंने अबोध बालको को बुलाया, जो अपने माता-पिता के पाप के विषय में कुछ नहीं जानते थे। वे तो एक अत्याचार के शिकार थे। उन्होंने वाल्मीकि से कहा की "सीता यदि पवित्र और सती है तो वे सभा में आएं और अपने ऊपर लगाए गए कलंक को धोकर अपना सतीत्व प्रमाणित करें। आखिर, वे लंका में ऐसा कर चुकी है।" ऐसा तो उन्हें जंगल में जाने से पूर्व भी कहा जा सकता था। राम ने कोई वचन भी नहीं दिया की परीक्षा में सफल हो जाने पर वे सीता को फिर रख लेंगे। वाल्मीकि ने सीता को सभा में प्रस्तुत किया। जब पति-पत्नी आमने-सामने थे, वाल्मीकि बोले, "हे दशरथ के पुत्र यह सीता खड़ी है, जिसे तुमने लोगों की कानाफूसी के कारण त्याग दिया था, जिन्हें मैंने अपने आश्रम में पाला है।" राम ने कहा, "मैं जानता हूँ की सीता पवित्र है और यह मेरे पुत्र है। इन्होंने लंका में भी अपनी सतीत्व का प्रमाण दिया है। मैं इन्हें साथ ले आया परन्तु लोगो को अभी संदेह है। सीता वह परीक्षा यहाँ भी दे, जिसे सभी ऋषि और प्रजा भी देख लें।"
सीता ने नेत्र भूमि पर गड़ाए। दोनों हाथ जोड़कर प्रण लिया- "यदि मैंने सपने में भी राम को छोड़कर, कभी किसी व्यक्ति का विचार भी किया हो तो धरतीमाता तू फट जा और मुझे अपने में समा ले। यदि मैंने सदा राम को प्यार किया हो, मेरे कार्यो और विचारों में वही बसे हो तो धरतीमाता तू फट जा और मुझे अपने में समा ले।" जब उन्होंने यह प्रतिज्ञा दुहराई तो धरती फट गई। एक स्वर्ण सिंहासन उभरा। वह उस पर विराज गई। आकाश से पुष्पो की वर्षा हुई। सभी देखकर आनन्दविभोर हो गए।
इसका अर्थ है की सीता ने राम के पास वापस जाने के बजाय मर जाना बेहतर समझा। जिस राम ने उसके साथ कसाई से अच्छा व्यवहार नहीं किया, यह उस सीता की गति और राम का पाप था।
राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है। क्या इससे यह प्रमाणित होता है।
वास्तविकता यह है की राम ने कभी राजपाट किया ही नहीं। वह तो सांकेतिक राजा थे। वाल्मीकि के अनुसार शासन-कार्य भरत देखते थे। राम ने राज-काज और प्रजा की चिंताओं से मुक्ति पा ली थी। राम के राजा बनने के बाद की दिनचर्या का वाल्मीकि ने बहुत बारीकी से वर्णन किया है। (उत्तरकाण्ड सर्ग 42, श्लोक 27) उसके अनुसार पूरा दिन पूर्वाहन और अपराहन में विभाजित रहता था। सवेरे से मध्यान्ह तक वह पूजा पाठ में व्यस्त रहते थे। अपराहन वे क्रमश: दरबारी विदूषकों और अंत:पुर में व्यतीत करते थे। (उत्तरकाण्ड सर्ग 43, श्लोक 1) जब वे रंग महल से ऊब जाते थे तो विदूषकों की संगती करते थे और जब विदूषकों से ऊब जाते थे, रंगमहल में चले आते थे। वाल्मीकि विस्तार से बताते है की राम रनिवास में कैसे समय बिताते थे? यह रंग महल अशोक वन नामक उपवन में था। वही राम भोजन करते थे। वाल्मीकि के अनुसार उनके भोजन में अनेक स्वादिष्ट व्यंजन होते थे। उसमे मांस, फल और मदिरा सम्मिलित थी। राम, मद्य त्यागी नहीं थे। वे प्रचुर मात्रा में मदिरापान करते थे और सीता को भी मदिरापान में सहभागिनी बनाते थे।(उत्तरकाण्ड सर्ग 42, श्लोक 8) राम के अंत:पुर का जैसा वर्णन वाल्मीकि ने किया है, वह कोई मामूली बात नहीं है। नाच-गाने में अप्सराएं, उरग और किन्नर बालाए सम्मिलित होती थी। अन्य क्षेत्रो से भी सुन्दर नारिया लाई जाती थी। राम सूरा और सुंदरियों के मध्य विराजते थे। वे राम को आनंदित करती और राम उन्हें माला पहनाते। वाल्मीकि ने राम को स्त्रियों के प्रिय पुरुषों का राजकुमार कहा है। यह उनकी एक दिन की जीवनचर्या नहीं थी। यह उनके जीवन की नियमित गति थी।
जैसा की पहले कहा जा चूका है, राम ने प्रजा-कार्यों से हाथ खिंच रखा था। वह अन्य भारतीय राजाओं की तरह प्रजा का दुख-दर्द सुनकर निवारण का कोई प्रयास नहीं करते थे। वाल्मीकि के अनुसार मात्र एक अवसर पर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से किसी की शिकायत सुनी। किन्तु दुर्भाग्य से वह घटना बहुत दुखांत है। उन्होंने किसी की एक गलती के लिए स्वयं इतना बड़ा अपराध किया, जिसकी इतिहास में मिसाल नहीं है। यह घटना थी- एक शुद्र शम्बूक की हत्या। वाल्मीकि के लिखा है - "राम-राज्य में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती थी। परन्तु किसी ब्राम्हण के पुत्र की अकाल मृत्यु हो गई। दुःखी पिता मृत पुत्र के शव को राज के महल पर ले आया और वह रख दिया और जोर-जोर से विलाप करने लगा और अपने पुत्र की मृत्यु पर राम को भांति-भांति से कोसने लगा। वह कह रहा था की इसके राज्य में यह पापाचार का परिणाम है और यदी राजा अपराधी को दण्ड नहीं देगा तो वह पुत्र उसे नहीं मिलेगा। वह राम के द्वार पर अनशन करेगा और अन्न-जल लिए बिना अपने प्राण त्याग देगा। राम ने नारद और आठ विद्वान ऋषियों की सभा बुलाई। उन्होंने कहा की उनकी प्रजा में से संभवत: कोई शुद्र तपस्या कर रहा है। यह धर्म विरुद्ध है क्योंकि तपस्या करने का अधिकार मात्र द्विजों को है। राम समझ गए की धर्म का उल्लंघन करके वह पाप कर रहा है। उसी के कारण ब्राम्हण का पुत्र मर गया। इसलिए राम ने अपना पुष्पक विमान मंगाया और राज्य के आंतरिक भागों में अपराधी को खोजा। अंत में घने जंगलो में सुदूर दक्षिण में उन्होंने एक व्यक्ति को कठोर तपस्यारत देखा। वे उसके पास गए और उसके यह बताने के बाद की वह शम्बूक नाम का शुद्र है और वह सशरीर स्वर्ग जाने के लिए तपस्या कर रहा है, उन्होंने उसे चेताया तक नहीं, अनधिकृत कार्य न करने के लिए समझाया भी नहीं। बस! बेझिझक उसका सर काट दिया। देखा! उसी समय दूर अयोध्या में ब्राम्हण पुत्र की सांस चलने लगी। जंगल में देवताओं ने पुष्प वर्षा की कि राजा ने एक शुद्र को आकाश में उनकी नगरी में आने से रोक दिया, जो तपस्या के बल पर वहाँ पहुँच जाता जिसे तपस्या का अधिकार नहीं है। वे राम के सम्मुख प्रकट हुए और उन्हें बधाई दी। जब राम ने ब्राम्हण के पुत्र को जीवित करने का अनुरोध किया तो उन्होंने बताया की वह जीवित हो चूका है। फिर वे चले गए। राम तब पास ही अगस्त्य ऋषि के आश्रम में पहुंचे। उन्होंने शम्बूक को दी गई सजा पर उनकी प्रशंसा की और उन्हें एक ताबीज भेट दिया।" राम राजधानी लौट आए।
ऐसे थे राम!
- हिंदू धर्म की पहिलियां
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर
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